विज्ञान – फायदे और नुकसान पर हिन्दी में निबंध | Essay on Science – Advantages And Disadvantages in Hindi

विज्ञान - फायदे और नुकसान पर निबंध 500 से 600 शब्दों में | Essay on Science – Advantages And Disadvantages in 500 to 600 words

हम इस मुकाम पर आ गए हैं कि अब हम विज्ञान के बिना नहीं रह सकते। के महत्व को समझने के विज्ञान लिए रात में कुछ समय के लिए मुख्य स्विच को बंद कर दें और देखें कि यह कैसा दिखता है। रोशनी या पंखे के बिना हम एक मिनट का भी प्रबंधन नहीं कर सकते।

इसी तरह विज्ञान की मदद से हमारे हर कदम को आसान बना दिया। जहां तक ​​विज्ञान के डाई बेनिफिट की बात है, तो 011 पर जाकर एक लंबी लिस्ट लिख सकते हैं। उसे विस्तृत करने की आवश्यकता नहीं है। स्कूल में कोई भी बच्चा इसके प्लस पॉइंट में से कम से कम दस अंक दे सकता है। लेकिन, एक सिक्के की तरह जिसके दो पहलू होते हैं, विज्ञान के भी अपने नुकसान हैं, खासकर जब परमाणु हथियारों की बात आती है जो कुछ ही समय में हजारों लोगों को मार सकते हैं।

सोमवार, 20 अप्रैल, 2009 को ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में एक लेख छपा (पेज # 14) कहता है कि, नए शोध से पता चलता है कि अकेले चीनी परमाणु परीक्षणों ने 1964 से 1996 तक 190,000 लोगों की जान ले ली।

यह विकिरण से जुड़ी बीमारी के कारण था। यह सतह पर नहीं आया क्योंकि परमाणु बमों ने द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर विनाश का कारण बना, जिसके बारे में हमने इतिहास में अध्ययन किया है। यदि यह युद्ध और आधुनिक हथियार के लिए नहीं है, तो विज्ञान हम सभी की मदद करने के लिए एक अद्वितीय हाथ प्रदान करता है।

विज्ञान के डाई क्षेत्र में भारत बहुत पीछे है। अमेरिका ने 40 साल पहले चांद की खोज की थी। लेकिन अब केवल हमने एक रॉकेट ‘चंद्रयान’ भेजा है जो कुछ दूरी पर चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा करता है। जो भी हो, यह भारत के लिए एक प्रगति है।

हालांकि, इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि उसी भारतीय मूल के वैज्ञानिक श्री चंद्रशेखर ने संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की थी। अगर ऐसा है तो हम पीछे क्यों रहें?

इसका कारण सरकारी कामकाज में नौकरशाही है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में एक विश्लेषणात्मक वैज्ञानिक को खुली छूट दी जाती है, जबकि यहां की बदकिस्मती के रूप में राजनीति और कठोर नियम प्रचलित हैं!

एक वैज्ञानिक, जिसके पास कुछ लिखने के लिए एक स्क्रैच पैड होता है, उसे ‘अनुमोदन और प्रतिहस्ताक्षर’ के लिए अपने स्टेशनरी अनुरोध कार्ड को अपने उच्च अधिकारियों को जमा करने की आवश्यकता होती है, जो फिर से उसी की मंजूरी के लिए जारीकर्ता प्राधिकारी की जांच के दायरे में आएगा।

भारत में ऐसे कई ‘मानव निर्मित’ अवरोध हैं। जब तक भारत इन प्रथाओं को त्याग कर खुद को सुधार नहीं लेता, तब तक हमारा देश अन्य देशों से बहुत पीछे रह जाएगा। और परेशान वैज्ञानिकों के पास विदेशों में प्रवास करने का विकल्प चुनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा।

क्या यह स्थिति कभी बदलेगी? कहा जाता है कि परिवर्तन निरंतर होते रहते हैं, लेकिन भारत में प्रचलित नौकरशाही इस नियम से छूट है। यह कभी नहीं बदलेगा, जब तक कि हमारे राजनेता खुद को नहीं बदलेंगे!


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